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लाल कृष्ण आडवाणी का वो ऐतिहासिक भाषण जिसे हर किसी को जानना चाहिए

ROHIT RAAJ TIHOR... 2020-09-30 08:50:23 राजनीती

मैं जब पीछे मुड़कर के देखता हूँ, तो मेरे जीवन का और मेरे जीवन के प्रमुख घटनाओ का आरंभ स्वतंत्रता प्राप्ति से नही होता। अंग्रेजों का शासन मैने देखा है, और वो जीवन के आरंभिक 20 वर्ष, मन की एक ही इच्छा रहती थी, कि इस साम्राज्यवाद से मुक्ति कब होगी, कैसे होगी. और उन दिनों में सचमुच जब महात्मा गाँधी के बारे मे सुनते थे, या उनको दो एक बार देखने का भी अवसर मुझे कराँची मे आया, बाद मे यहां आने के बाद आया तो सचमुच लगता था कि ऐसे महामानव बहुत विरले विश्व मे पैदा होते है. और आज मैं जब भारत के बारे मे सोचता हूं, तो भारत स्वतंत्र हो गया है, भारत एक अणुशक्ति भी बन गया है. भारत आने वाले वर्षो मे एक विश्वशक्ति बन जाएगा, इसमे भी लोगों को संदेह नही है. लेकिन यह सब विशेषताएं होते हुए भी, मुझसे कोई आज अगर पूछता है कि सबसे बड़ी विशेषता कौन सी है कि जो अंग्रेज से मुक्ति पाने के बाद, स्वतंत्र होने के बाद, भारत मे संविधान बनने के बाद, और आज संसद का पहला पहला दिन से लेकर के, 60 वर्ष बीत जाने के बाद, सबसे बड़ी उपलब्धी आप किसे मानोगे, तो

मै कहूँगा, जिस कारण से आज हम ये दिन मना रहे हैं, कि भारत एक महान और सफल लोकतंत्र बना है. इस उपलब्धी को मै सबसे बड़ी उपलब्धी मानता हूँ. उन दिनो मे कोई देखे कि जब भारत मे 1950 मे लोकतंत्र अपनाया, तो विदेशी विद्वानों ने कैसी-कैसी टिप्पणियां की. यह देश लोकतंत्रीय देश बनेगा. और मैं किसी को क्वोट नही करता हूँ, लेकिन वहां के बड़े-बड़े विव्दानों ने भी कहा कि, जिस देश मे करोड़ो नाम नही लिख सकते, अगर किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते है, तो अंगूठा लगा करके, अपना हस्ताक्षर करते है. वो देश लोकतंत्र कैसे बनेगा. वह देश सफल लोकतंत्र कैसे बनेगा. यह आशंका प्रकट करने वाले, अनास्था प्रकट करने वाले बहुत सारे लोग थे. और आज उनकी सारी अनास्था को अविश्वास को झुठलाने वाला, यह देश...गर्व के साथ कह सकता है, कि हमने 60 साल तक इस देश को एक सफल लोततंत्र बनाए रखा है. जिसको मनाने के लिए आज हम इस 13 तारीख, 13 मई को यह विशिष्ट अवसर मना रहे हैं.

मुझे याद है कि 1989 या 1990 की बात होगी, कि जब मैं पार्टी का अध्यक्ष था. एक कैनेडियन टेलीवीजन टीम नई दिल्ली आई थी. मुझसे भेंट वार्ता करने के लिए मेरे अशोका रोड के कार्यालय मे आई. और आकर के उन्होने कहा कि, आपका इतना अनुभव है भारत के लोकतंत्र का, स्वतंत्रता प्राप्ति से ले करके आज तक का... हम आपसे जानना चाहते है, कि जहां दुनिया भर मे जो भी विकासशील देश थे, और उन्होने साम्राज्यवाद से मुक्ति पाने के बाद लोकतंत्र अपनाया, लेकिन अधिकांश देशों मे लोकतंत्र किसी म किसी प्रकार से विसर्जित हो गया. कही पर सैनित शासन आ गया, कही पर और प्रकार का कोई अधिनायकवादी शासन आ गया. अकेला आपका देश है कि जहां पर यह आज भी सजीव है, आज भी सफल है, और आज भी भविष्य अपना उसके आधार पर ही निश्चय रखता है, संकल्प करता है क्या कारण है.

मैने कहा मै सोचता हूँ तो मुझे एक ही बात सूझती है, और ये सूझती है कि लोकतंत्र की सफलता के लिए, सबसे बड़ा कोई गुण चाहिए तो वो ये चाहिए कि एक विपरीत विचारधारा के बारे मे भी सहिष्णुता का भाव हो. लेकिन मै इस बात का गर्व करता हूँ, कि हमारे यहां पर विपरीत विचारधारा के लिए, या विचारों के लिए केवल सहिष्णुता का भाव नही होता है, आदर का भाव होता है मैं उदाहरण के रूप मे कहता हूं, कि असहिष्णुता सबसे अधिक किसी क्षेत्र मे होती है, तो वह रिलीजन के क्षेत्र मे होती है, पंथ के मजहब के इन क्षेत्रो मे होती है. और उस क्षेत्र मे दुनिया भर मे तों साइंटिस्ट को भी, और इनक्वीशन के सामने लाया गया कि, तुम जो बात कह रहे हो, वो धर्मग्रंथ मे नही लिखी है. इसी लिए तुम्हारा ट्रायल होगा. हिदुस्तान मे ट्रायल तो छोडिए एक ऐसा विचारक था, जिस विचारक ने कहा कि ये जो आप लोग कहते है कि अच्छा आचरण करो तो जन्म मे उसका तुमको पुण्य मिलेगा. ये पंडित बेकार बात करते है, आप फिक्रमत करो उनकी, और आप खूब खाओ-पिओ मौज करो. चार्वाक का प्रसिध्द वाक्य है.

यावज्जीवेत्सुखं जीवते रिण क्रत्वा घ्रत पिबेत, रिण क्रत्वा पिबेत अर्थात- कर्जा लो और घी पियो.

वेस्टर्न कंट्री मे कभी इसको सुनाता था, मै उनको कहता था कि, वो credit cards के बारे मे बात नही कर रहे थे,

यह देह तो भस्म होने वाला है. ये सोचना की अगला जन्म आएगा, कुछ नही आएगा. बेकार बात है. और ये कहने वाला चार्वाक उसको Inquisition(न्यायिक जांच) के सामने नही खड़ा किया, उसको ऋषि चार्वाक कहा

अर्थात सहिष्णुता नहीं लेकिन आदर का भाव, जब पंथ के मजहब के क्षेत्र मे विपरीत विचार वाले का आदर हो, उसको ऋषि कहा जाये. तो आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र मे, अगर कोई व्यक्ति कहता है कि पूरा का पूरा राज्य के अधीन होना चाहिए. दूसरा कहे कि सारा का सारा एक आदमी के अधीन हो जाए.. होना चाहिए.

इस पर मतभेद में असहिष्णुता कैसे हो गई. मै मानता हूँ कि भारत मे लोकतंत्र की सफलता का प्रमुख कारण है, विपरीत विचाराधारा के लिए आदर का भाव. और संसद इसका बहुत बड़ा उदाहरण है. मेरे वरिष्ठ सहयोगी मुझ से तीन-चार महीने सीनियर है संसद मे, और मै...दोनो हम राज्य सभा में ही पहले आए. और उन्होने जो अभी-अभी बात कहीं, मै उसको पूरी तरह से endorse(समर्थन) करता हूँ. और मै कहता हूँ कि अगर हम एक दूसरे के प्रति आदर का भाव रखेगें, विपरीत विचारधारा के प्रति आदर का भाव रखेगें, तो डिवेट के द्वारा ही, बहस के द्वारा ही, विवाद के द्वारा ही, हर समस्या का हल निकल आएगा, और संसद की सफलता इसी मे है.

13 मई 2012 मे लाल क्रष्ण आडवाना ने संसद मे भाषण दिया था, ये शब्द व शब्द लिया गया है.

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